भारतीय किसानों की समस्याएं (Problems of Indian Farmers)

भारतीय किसानों की समस्याएं: खाद्य और कृषि संगठन द्वारा 1970 से 2001 तक भारत की कृषि वृद्धि के 2003 के विश्लेषण ने भारतीय कृषि में प्रणालीगत समस्याओं की पहचान की। खाद्य स्टेपल के लिए, छह-वर्षीय खंडों 1970-76, 1976–82, 1982-88, 1988-1994, 1994-2000 के दौरान उत्पादन में वार्षिक वृद्धि दर क्रमशः 2.5, 2.5, 3.0, 2.6, और 1.8  % प्रति वर्ष पाई गई। कुल कृषि उत्पादन के सूचकांक के लिए अनुरूप विश्लेषण एक समान पैटर्न दिखाता है, जिसमें 1994-2000 की विकास दर केवल 1.5% प्रति वर्ष प्राप्त होती है।

किसानों की समस्या

किसानों की सबसे बड़ी समस्या उनके कृषि उत्पादों की कम कीमत है। हाल के एक अध्ययन से पता चला है कि उत्पादन की ऊर्जा पर आधारित उचित मूल्य निर्धारण और कृषि मजदूरी को औद्योगिक मजदूरी के बराबर करना किसानों के लिए फायदेमंद हो सकता है।
Kisano Ki Samasya

ये हैं भारतीय किसानों की मूल समस्याएं

भारत की पहचान एक कृषि प्रधान देश के रूप में रही है लेकिन देश के बहुत से किसान बेहाल हैं। इसी के चलते पिछले कुछ समय में देश में कई बार किसान आंदोलनों ने जोर पकड़ा है। एक नजर किसानों की मूल समस्याओं पर-

1. भूमि पर अधिकार

देश में कृषि भूमि के मालिकाना हक को लेकर विवाद सबसे बड़ा है। असमान भूमि वितरण के खिलाफ किसान कई बार आवाज उठाते रहे हैं। जमीनों का एक बड़ा हिस्सा बड़े किसानों, महाजनों और साहूकारों के पास है जिस पर छोटे किसान काम करते हैं। ऐसे में अगर फसल अच्छी नहीं होती तो छोटे किसान कर्ज में डूब जाते हैं।

2. फसल पर सही मूल्य

किसानों की एक बड़ी समस्या यह भी है कि उन्हें फसल पर सही मूल्य नहीं मिलता। वहीं किसानों को अपना माल बेचने के तमाम कागजी कार्यवाही भी पूरी करनी पड़ती है। मसलन कोई किसान सरकारी केंद्र पर किसी उत्पाद को बेचना चाहे तो उसे गांव के अधिकारी से एक कागज चाहिए होगा। ऐसे में कई बार कम पढ़े-लिखे किसान औने-पौने दामों पर अपना माल बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

3. अच्छे बीज

अच्छी फसल के लिए अच्छे बीजों का होना बेहद जरूरी है। लेकिन सही वितरण तंत्र न होने के चलते छोटे किसानों की पहुंच में ये महंगे और अच्छे बीज नहीं होते हैं। इसके चलते इन्हें कोई लाभ नहीं मिलता और फसल की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

4. सिंचाई व्यवस्था

भारत में मॉनसून की सटीक भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। इसके बावजूद देश के तमाम हिस्सों में सिंचाई व्यवस्था की उन्नत तकनीकों का प्रसार नहीं हो सका है। उदाहरण के लिए पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में सिंचाई के अच्छे इंतजाम है लेकिन देश का एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जहां कृषि, मॉनसून पर निर्भर है। इसके इतर भूमिगत जल के गिरते स्तर ने भी लोगों की समस्याओं में इजाफा किया है।

5. मिट्टी का क्षरण

तमाम मानवीय कारणों से इतर कुछ प्राकृतिक कारण भी किसानों और कृषि क्षेत्र की परेशानी को बढ़ा देते हैं। दरअसल उपजाऊ जमीन के बड़े इलाकों पर हवा और पानी के चलते मिट्टी का क्षरण होता है। इसके चलते मिट्टी अपनी मूल क्षमता को खो देती है और इसका असर फसल पर पड़ता है।

6. मशीनीकरण का अभाव

कृषि क्षेत्र में अब मशीनों का प्रयोग होने लगा है लेकिन अब भी कुछ इलाके ऐसे हैं जहां एक बड़ा काम अब भी किसान स्वयं करते हैं। वे कृषि में पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। खासकर ऐसे मामले छोटे और सीमांत किसानों के साथ अधिक देखने को मिलते हैं। इसका असर भी कृषि उत्पादों की गुणवत्ता और लागत पर साफ नजर आता है।

7. भंडारण सुविधाओं का अभाव

भारत के ग्रामीण इलाकों में अच्छे भंडारण की सुविधाओं की कमी है। ऐसे में किसानों पर जल्द से जल्द फसल का सौदा करने का दबाव होता है और कई बार किसान औने-पौने दामों में फसल का सौदा कर लेते हैं। भंडारण सुविधाओं को लेकर न्यायालय ने भी कई बार केंद्र और राज्य सरकारों को फटकार भी लगाई है लेकिन जमीनी हालात अब तक बहुत नहीं बदले हैं।

8. परिवहन भी एक बाधा

भारतीय कृषि की तरक्की में एक बड़ी बाधा अच्छी परिवहन व्यवस्था की कमी भी है। आज भी देश के कई गांव और केंद्र ऐसे हैं जो बाजारों और शहरों से नहीं जुड़े हैं। वहीं कुछ सड़कों पर मौसम का भी खासा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में, किसान स्थानीय बाजारों में ही कम मूल्य पर सामान बेच देते हैं। कृषि क्षेत्र को इस समस्या से उबारने के लिए बड़ी धनराशि के साथ-साथ मजबूत राजनीतिक प्रतिबद्धता भी चाहिए।

9. पूंजी की कमी

सभी क्षेत्रों की तरह कृषि को भी पनपने के लिए पूंजी की आवश्यकता है। तकनीकी विस्तार ने पूंजी की इस आवश्यकता को और बढ़ा दिया है। लेकिन इस क्षेत्र में पूंजी की कमी बनी हुई है। छोटे किसान महाजनों, व्यापारियों से ऊंची दरों पर कर्ज लेते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों में किसानों ने बैंकों से भी कर्ज लेना शुरू किया है। लेकिन हालात बहुत नहीं बदले हैं।

भारतीय किसान और उसकी स्थिति

भारत संरचनात्मक दृष्टि से गांवों का देश है, और सभी ग्रामीण समुदायों में अधिक मात्रा में कृषि कार्य किया जाता है इसी लिए भारत को भारत कृषि प्रधान देश की संज्ञा भी मिली हुई है। लगभग 70% भारतीय लोग किसान हैं। वे भारत देश के रीढ़ की हड्डी के समान है। खाद्य फसलों और तिलहन का उत्पादन करते हैं। वे वाणिज्यिक फसलों के उत्पादक है। वे हमारे उद्योगों के लिए कुछ कच्चे माल का उत्पादन करते इसलिए वे हमारे राष्ट्र के जीवन रक्त है। भारत अपने लोगों की लगभग 60 % कृषि पर प्रत्यक्ष या पपरोक्ष रूप से निर्भर भारतीय किसान पूरे दिन और रात काम करते है। वह बीज बोते है और रात में फसलों पर नजर रखते भी है। वह आवारा मवेशियों के खिलाफ फसलों की रखवाली करते। वह अपने बैलों का ख्याल रखते है। आजकल, कई राज्यों में बैलों की मदद से खेती करने कि संख्या लगभग खत्म हो गई हैं और ट्रैक्टर की मदद् से खेती कि जाती है। उनकी पत्नीय़ॉ और बच्चों उनके काम में उनकी मदद करते है।

किसानों की हालत

भारतीय किसान गरीब है। उनकी गरीबी पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। किसान को दो वक्त का खाना भी नसीब नहीं हो पाता। उन्हें मोटे कपड़े का एक टुकड़ा नसीब नही हो पाता है। वह अपने बच्चों को शिक्षा भी नहीं दे पाते। वह अपने बेटे और बेटियों का ठीक पोशाक तक खरीद कर नहीं दे पाते। वह अपनी पत्नी को गहने पहऩऩे का सुख नहीं दे पाते। किसान की पत्नी कपड़े के कुछ टुकड़े के साथ प्रबंधित करने के लिए है। वह भी घर पर और क्षेत्र में काम करती है। वह गौशाला साफ करती, गाय के गोबर बनाकर दिवारो पर चिपकाती और उन्हें धूप में सूखाती। वह गीले मानसून के महीनों के दौरान ईंधन के रूप में उपयोग होता। भारतीय किसान को गांव के दलालों द्वारा परेशान किया जाता है। वह साहूकार और कर संग्राहकों से परेशान रहते इसलिए वह अपने ही उपज का आनंद नहीं कर पाते हैं। भारतीय किसान के पास उपयुक्त निवास करने के लिए घर नहीं होता। वह भूसे फूस की झोपड़ी में रहते है। उसका कमरा बहुत छोटा है और डार होता। जबकी बड़े किसानों का बहुत सुधार हुआ है, छोटे भूमि धारकों और सीमांत किसानों की हालत अब भी संतोषजनक से भी कम है।

पुराने किसानों की अधिकांश अनपढ़ आदि ज्यादा पढी-लिखी नहीं थी लेकिन नई पीढ़ी के अधिकतर किसान शिक्षित हैं। उनके शिक्षित होने के नाते उन्हें बहुत मदद मिलती है। वे प्रयोगशाला में अपने खेतों की मिट्टी का परीक्षण करवा लेते है। इस प्रकार, वे समझ जाते की उनके क्षेत्रों में सबसे ज्यादा फसल किसकी होगी। भारतीय किसान सरल संभव तरीके से सामाजिक समारोह मनाता है। वह हर साल त्योहार धूम से मनाते है। वह अपने बेटे और बेटियों की शादी का जश्न भी धूम से मनाते। वह अपने परिजनों और दोस्तों और पड़ोसियों के मनोरंजन भी करने में कसर नहीं छोडते।

भारतीय किसानों का जीवन सुधारने के उपाय

किसानों की मॉग मुफ्त बिजली और पानी नहीं है, बल्कि बिजली की निर्बाध आपूर्ति के लिए हैं जिसके लिये वे भुगतान करने के लिए तैयार है। पंजाब जैसे राज्यों में, पहली बार में हरित क्रांति से किसानों को बहुत मदद मिली लेकिन कम कीमतों मैं बम्पर फसलों की उपज के कारण उनके काम मैं बधाओ ने आना शुरु कर दिया। भारतीय किसानों की हालत में सुधार किया जाना चाहिए। उन्हे खेती की आधुनिक विधि सिखाया जाना चाहिए। उन्हे साक्षर बनाया जाना चाहिए। उनको पढा लिखा बनाना चाहिए। वह हर संभव तरीके में सरकार द्वारा सहायता प्रदान की जानी चाहिए। छोटे किसानों ने भी कुछ कुटीर उद्योग शुरू करने का निर्णय ले लिया। फसल चक्र प्रणाली और अनुबंध फसल प्रणाली कुछ राज्यों में शुरू कर दिया गया। इस तरह के कदम किसानो को सही दिशा में ले जाते और लंबे समय तक किसानी करने में मदद करते। भारत का कल्याण किसानो पर ही निर्भर करता है।

भारत में किसान आत्महत्या

Problem of farmer suicide

भारत में किसान आत्महत्या 1990 के बाद पैदा हुई स्थिति है जिसमें प्रतिवर्ष दस हज़ार से अधिक किसानों के द्वारा आत्महत्या की रपटें दर्ज की गई है। 1997 से 2006 के बीच 1,66,304 किसानों ने आत्महत्या की।

भारतीय कृषि बहुत हद तक मानसून पर निर्भर है तथा मानसून की असफलता के कारण नकदी फसलें नष्ट होना किसानों द्वारा की गई आत्महत्याओं का मुख्य कारण माना जाता रहा है। मानसून की विफलता, सूखा, कीमतों में वृद्धि, ऋण का अत्यधिक बोझ आदि परिस्तिथियाँ, समस्याओं के एक चक्र की शुरुआत करती हैं। बैंकों, महाजनों, बिचौलियों आदि के चक्र में फँसकर भारत के विभिन्न हिस्सों के किसानों ने आत्महत्याएँ की है।

1990 ई. में प्रसिद्ध अंग्रेजी अखबार द हिंदू के ग्रामीण मामलों के संवाददाता पी. साईंनाथ ने किसानों द्वारा नियमित आत्महत्याओं की सूचना दी। आरंभ में ये रपटें महाराष्ट्र से आईं। जल्दी ही आंध्रप्रदेश से भी आत्महत्याओं की खबरें आने लगी।

शुरुआत में लगा की अधिकांश आत्महत्याएँ महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के कपास उत्पादक किसानों ने की है। लेकिन महाराष्ट्र के राज्य अपराध लेखा कार्ययालय से प्राप्त आँकड़ों को देखने से स्पष्ट हो गया कि पूरे महाराष्ट्र में कपास सहित अन्य नकदी फसलों के किसानों की आत्महत्याओं की दर बहुत अधिक रही है।

आत्महत्या करने वाले केवल छोटी जोत वाले किसान नहीं थे बल्कि मध्यम और बड़े जोतों वाले किसानों भी थे। राज्य सरकार ने इस समस्या पर विचार करने के लिए कई जाँच समितियाँ बनाईं। भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्य सरकार द्वारा विदर्भ के किसानों पर व्यय करने के लिए 110 अरब रूपए के अनुदान की घोषणा की। बाद के वर्षों में कृषि संकट के कारण महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, आंध्रप्रदेश, पंजाब, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी किसानों ने आत्महत्याएँ की।

इस दृष्टि से 2009 अब तक का सबसे खराब वर्ष था जब भारत के राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय ने सर्वाधिक 17,368 किसानों के आत्महत्या की रपटें दर्ज की। सबसे ज़्यादा आत्महत्याएँ महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में हुई थी। इन 5 राज्यों में 10,765  यानी 62% आत्महत्याएँ दर्ज हुई।

किसान आत्महत्या के आंकड़े

राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय के आँकड़ों के अनुसार भारत भर में 2008 ई. में 16,196 किसानों ने आत्महत्याएँ की थी। 2009 ई. में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या में 1,172 की वृद्धि हुई। 2009 के दौरान 17,368 किसानों द्वारा आत्महत्या की आधिकारिक रपट दर्ज हुई। "राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय" द्वारा प्रस्तुत किये गए आँकड़ों के अनुसार 1994 से 2011 के बीच 17 वर्ष में 7 लाख, 50 हजार, 760 किसानों ने आत्महत्या की है।

भारत में धनी और विकसित कहे जाने वाले महाराष्ट्र में अब तक आत्महत्याओं का आँकड़ा 50 हजार 760 तक पहुँच चुका है। 2011 में मराठवाड़ा में 435, विदर्भ में 226 और खानदेश (जलगाँव क्षेत्र) में 133 किसानों ने आत्महत्याएँ की है।

आंकड़े बताते हैं कि 2004 के पश्चात् स्थिति बद से बदतर होती चली गई। 1991 और 2001 की जनगणना के आँकड़ों को तुलनात्मक देखा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि किसानों की संख्या कम होती चली जा रही है। 2001 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस वर्षों में 70 लाख किसानों ने खेती करना बंद कर दिया।

2011 के आंकड़े बताते हैं कि पाँच राज्यों क्रमश: महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कुल 1534 किसान अपने प्राणों का अंत कर चुके हैं।

सरकार की तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद कर्ज के बोझ तले दबे किसानों की आत्महत्या का सिलसिला नहीं रूक रहा। देश में हर महीने 70 से अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं।

किसान आत्महत्या के कारण

किसानों को आत्महत्या की दशा तक पहुँचा देने के मुख्य कारणों में खेती का आर्थिक दृष्टि से नुकसानदायक होना तथा किसानों के भरण-पोषण में असमर्थ होना है।

कृषि की अनुपयोगिता/ आत्महत्या के मुख्य कारण हैं:

  • कृषि जोतों का छोटा होते जाना - 1960-61 ई. में भूस्वामित्व की इकाई का औसत आकार 2.3 हेक्टेयर था जो 2002-03 ई. में घटकर 1.06 हेक्टेयर रह गया।
  • भारत में उदारीकरण की नीतियों के बाद खेती (खासकर नकदी खेती) करने का तरीका बदल चुका है।
  • सामाजिक-आर्थिक बाधाओं के कारण “पिछड़ी जाति” के किसानों के पास नकदी फसल उगाने लायक तकनीकी जानकारी का अक्सर अभाव होता है और बहुत संभव है कि ऐसे किसानों पर बीटी-कॉटन आधारित कपास या फिर अन्य पूंजी-प्रधान नकदी फसलों की खेती से जुड़ी कर्जदारी का असर बाकियों की तुलना में कहीं ज्यादा होता हो।
  • किसानों के लिए खेती का खर्च लगातार बढ़ रहा है लेकिन किसान की आमदनी कम हुई है ।
  • छोटे किसान आर्थिक तंगहाली की सूरत में कर्ज के दुष्चक्र में पड़े है ।
  • किसानों का समर्थन कर रहे समूहों का कहना है कि अनाज की वास्तविक कीमतें किसानों को नहीं मिलती और उन्हें जीएम कंपनियों से कपास के काफी महंगे बीज और खाद खरीदने होते हैं ।
  • इन समूहों के मुताबिक जीएम बीज को खरीदने में कई किसान गहरे कर्ज में डूब जाते हैं ।
  • जब फसल की सही कीमत नहीं मिलती है तो उन्हें आत्महत्या कर लेना एकमात्र विकल्प नजर आता है ।

किसान की आत्महत्या का प्रभाव

किसान की आत्महत्या के बाद पूरा परिवार उसके असर में आ जाता है । बच्चे स्कूल छोड़कर खेती-बाड़ी के कामों में हाथ बँटाने लगते हैं । परिवार को कर्ज की विरासत मिलती है और इस बात की आशंका बढ़ जाती है कि बढ़े हुए पारिवारिक दबाव के बीच परिवार के कुछ अन्य सदस्य कहीं आत्महत्या ना कर बैठें ।

किसान हमारे अन्नदाता है । उनकी आत्महत्या पूरे राष्ट्र के लिए शर्म की बात है । देश की केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारों को किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए युद्धस्तर पर प्रयत्न करने की आवश्यकता है । भारत जैसे कृषिप्रधान देश में यदि किसानों की ऐसी अवस्था हो तो हमारी प्रगति और विकास की सारी बातें, हमारी सारी उपलब्धियाँ अर्थहीन हैं । देश के अर्थशास्त्रियों, देश की सरकार को सबसे पहले इसी पर पूरा ध्यान केन्द्रित करना चाहिए ।

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