कृषि शिक्षा (Agriculture Education)

जिस देश में 1.25 अरब के लगभग आबादी निवास करती है और देश की 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर आधारित है, उस देश में कृषि शिक्षा के विश्वविद्यालय और कॉलेज नाम-मात्र के हैं, उनमें भी गुणवत्तापरक शिक्षा का अभाव है। भूमंडलीकरण के दौर में कृषि पर आधुनिक तकनीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के माध्यम से जो इस देश में आती हैं उसे कृषि का प्रचार-प्रसार तंत्र उन किसानों तक पहुंचाने में लाचार नजर आता है, यह गंभीर और विचारणीय विषय है। शिक्षा का ही दूसरा पहलू जिसे प्रबंधन शिक्षा की श्रेणी में रखा जा सकता है, नाम-मात्र भी नहीं है।

राष्ट्रीय अथवा प्रदेश स्तर पर कृषि शिक्षा के जो विश्वविद्यालय हैं, उनमें शोध संस्थानों के अभाव में उच्चस्तरीय शोध समाप्त प्राय से हैं। चाहे संस्थानों का अभाव हो, वित्तीय एवं तकनीकी सुविधाओं का अभाव हो अथवा गुणवत्तापरक शिक्षकों का अभाव हो, जिसके कारण एक हरित क्रांति के बाद फिर कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ। किसान ईश्वरीय कृपा पर ही आज भी निर्भर हैं। कृषि शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार ग्रामीण क्षेत्रों में होना चाहिए और प्रत्येक शिक्षण संस्थान में न्यूनतम माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा अवश्य होनी चाहिए। उन लोगों का उपयोग कृषि के निचले स्तर के व्यापक प्रचार-प्रसार और उत्पादन वृद्धि में किया जाना चाहिए।
Krishi Shiksha: Agriculture Education

कृषि शिक्षा

(Agriculture Education)

कृषि शिक्षा का अर्थ हैं कृषि के बारे में अध्ययन करना इसके लिए हमारे देश मैं बहुत सारे लगभग 65 एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी हैं। देश की सबसे बड़ी एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी नई दिल्ली IARI (Indian Agriculture Research Institute) हैं। वर्तमान में बढ़ रही जनंसख्या को देखते हुए कृषि शिक्षा बहुत जरुरी है। कृषि शिक्षा में b.sc, m.sc , Ph.d तक होती है। इसमे खेतो में लग रही बीमारी कीट के प्रकोप से बचने के लिए इसमें लार्ज स्केल पर इसका अध्ययन कर इनकी रोकथाम की स्टडी करते हैं। तथा देश में उपस्थित कृषि वैज्ञानिक कृषि शिक्षा की ही दें हैं। वर्त्तमान में इसका बहुत महत्व है। राजस्थान मैं 5 कृषि यूनिवर्सिटी हैं। जो निम्न हैं।

कृषि शिक्षा संभाग

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद: Indian Council of Agricultural Research - ICAR (Ministry of Agriculture and Farmers Welfare)

 कृषि शिक्षा संभाग देश में उच्च कृषि शिक्षा के क्षेत्र में नियोजन, विकास समन्वयन और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कार्य में संलग्न है। यह कार्य भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा कृषि विश्वविद्यालयों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, समतुल्य विश्वविद्यालयों, केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय और कृषि संकाय वाले केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की भागीदारी और प्रयत्नों से कृषि उच्च शिक्षा को लगातार, उत्तरोत्तर गुणवत्ता और सार्थकता हेतु किया जाता है। इस संभाग के तहत राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबन्धन अकादमी (नार्म) हैदराबाद है। इसका कार्य अनुसंधान और शिक्षा नीति, नियोजन और प्रबन्धन में राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान पद्धति (नार्स) में क्षमता निर्माण कार्य मुहैया करना है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद मुख्यालय में स्थित इस संभाग के प्रमुख उपमहानिदेशक (शिक्षा) हैं और इसके 3 अनुभाग हैं-
  1. मानव संसाधन विकास 
  2. शिक्षा नियोजन और विकास 
  3. शिक्षा गुणवत्ता सुनिश्चितता और सुधार
प्रत्येक अनुभाग के प्रमुख एक सहायक महानिदेशक हैं।

कृषि शिक्षा संभाग के लिए नागरिक / ग्राहक का चार्टर (2014-2015)

महत्वपूर्ण क्षेत्र

नीतिगत समर्थन, प्रत्यायन, शैक्षिक नियमन, वैयक्तिक नीतियों, पाठयक्रम की समीक्षा और डिलवरी पद्धति, बुनियादी ढांचे और सुविधाओं का सृजन/सुदृढ़ीकरक करके विकासात्मक समर्थन, संकाय क्षमता में सुधार और अखिल भारतीय प्रतियोगिताओं के जरिये छात्रों का दाखिला आदि के जरिये देश में उच्च कृषि शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता की सुनिश्चितता प्रदान करना। शिक्षा और अनुसंधान के महत्वपूर्ण क्षेत्र में नीतिगत समर्थन को बढ़ावा देकर, परीक्षण सीखने की सुविधा जुटाना ताकि छात्रों को ज्ञान, कौशल और व्यवहार संतुलित सम्मिश्रण मुहैया किया जा सके, और मांग आधारित भागीदारी और संबंधों के जरिये कृषि विश्वविद्यालयों में कार्यकुशलता और परिदृश्य को बढ़ाना।

राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में चेयर/पद के जरिये नेशनल प्रोफेसर, नेशनल फैलो, एमरिट्स वैज्ञानिक योजनाएं और छात्रों को स्कॉलरशिप और फैलोशिप के जरिये पुरस्कार और उत्कृष्ट अध्यापक पुरस्कार आदि द्वारा उत्कृष्टता और विशेषज्ञता को बढ़ावा देना।

राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान पद्धति (नार्स) का क्षमता निर्माण करना इसमें नार्म और क्षमता निर्माण हेतु राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संबंध बनाना है।

उपलब्धियां

  • कृषि शिक्षा में गुणवत्ता सुनिश्चितता हेतु प्रत्यायन मंडल की स्थापना की और 22 कृषि विश्वविद्यालयों का प्रत्यायन किया।
  • कृषि विश्वविद्यालयों में विशेष क्षेत्रों में नीतिगत सुदृढ़ता बढ़ाने हेतु 28 उत्कृष्टता के महत्वपूर्ण क्षेत्रों को स्वीकृति प्रदान की गयी इसमें नयी और मौजूदा महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियां शामिल हैं।
  • स्नातक स्तर पर छात्रों को कौशल उन्मुख हस्त प्रशिक्षण देने के लिए सभी विश्वविद्यालयों में परीक्षण ज्ञान की 200 ईकाइयां स्थापित की गयीं हैं।
  • शैक्षिक सुविधाओं, ढांचागत सुविधाओं और संकाय सुधार को अद्यतन और सुदृढ़ बनाने के लिए राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, केन्द्रीय विश्वविद्यालयों और समतुल्य विश्वविद्यालयों को नियमित वित्तीय और प्रोफेशनल समर्थन दिया गया।
  • स्नातक स्तर पर कृषि विश्वविद्यालयों में लागू करने के लिए संशोधित पाठ्यक्रम को स्वीकृति प्रदान की गयी।
  • इसमें कौशल निर्माण हेतु हस्त प्रशिक्षण और परीक्षण द्वारा सीखना शामिल हैं।
  • इसे परिषद द्वारा गठित चौथी डीन समिति द्वारा संस्तुति प्रदान की गयी है।
  • छात्राओं को बढ़ावा देने के लिए राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में बालिका छात्रावास के निर्माण हेतु वित्तीय सहायता प्रदान की गयी। प्रत्येक विश्वविद्यालय में एक बालिका छात्रावास की सुविधा प्रदान की गयी है।
  • राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में विदेशी छात्रों को शिक्षा देने के लिए 12 अन्तर्राष्ट्रीय छात्रावासों के निर्माण हेतु समर्थन दिया गया।
  • वित्तीय सहायता प्रदान करके स्नातक स्तर पर ग्रामीण जागरुकता कार्य अनुभव को बढ़ावा दिया गया।
  • शिक्षा में गुणवत्ता सुधार और अन्तः प्रजनन में कमी लाने के लिए छात्रों के दाखिले के लिए नियमित परीक्षाओं का आयोजन किया गया।
  • स्नातक स्तर पर 15% और स्नातकोत्तर स्तर पर 25% सीटों के लिए यह परीक्षा आयोजित की गयी।
  •  प्रति वर्ष लगभग 1350 मेधावी छात्रों का स्नातक कार्यक्रम में और 1600 छात्रों का स्नातकोत्तर कार्यक्रम में दाखिला होता है।
  • प्रति वर्ष महत्वपूर्ण क्षेत्रों में 90 ग्रीष्म/शीत विद्यालयों के जरिए लगभग 2400 वैज्ञानिकों को प्रशिक्षण दिया जाता है।
  • मानव संसाधन विकास, राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने और अन्तःप्रजनन को रोकने के लिए प्रति वर्ष स्नातक अध्ययन में 100 राष्ट्रीय मेधावी छात्रवृतियां, 275 कनिष्ठ अनुसंधान फैलोशिप स्नातकोत्तर अध्ययन के लिए और पी एच डी के लिए 200 वरिष्ठ अनुसंधान फैलोशिप प्रदान की जाती हैं।
  • एडवांस अध्ययन के 31 केन्द्रों द्वारा संकाय क्षमता में सुधार किया गया।
  • विदेशी छात्रों को अवसर देकर विकासशील देशों में भारतीय उच्च कृषि शिक्षा को बढ़ावा दिया गया।
  • कृषि विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों को अद्यतन किया गया और इसमें साहित्य तक ऑन लाइन पहुंच के लिए नेटवर्क शामिल है।
  • भा.कृ.अनु.प. राष्ट्रीय प्रोफेसर और राष्ट्रीय फैलो योजनाओं के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्टता को बढ़ावा दिया गया।
  • दसवीं योजना में विशेष क्षेत्रों में अनुसंधान के लिए 100 उत्कृष्ट सेवामुक्त वैज्ञानिकों को भा.कृ.अनु.प. अवकाश वैज्ञानिक पुरस्कार प्रदान किया गया।
  • सर्वश्रेष्ठ अध्यापक पुरस्कार द्वारा विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट अध्यापकों की पहचान की गयी।
  • सक्षम संकाय को शामिल करके विश्वविद्यालय स्तरीय पाठ्य पुस्तकों का प्रकाशन किया गया और ई-पाठ्य पुस्तकों और ई-सारांश को भी प्रोत्साहन दिया गया।
  • नार्म द्वारा राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान पद्धति (नार्स) में आवश्यकता आधारित क्षमता निर्माण विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए किया गया इसमें फाउंडेशन कोर्स, रेफ्रेशर कोर्स, वर्कशाप और सेमिनार तथा अन्तर्राष्ट्रीय कार्यक्रम शामिल हैं।
  • इसके अलावा नार्स के प्रदर्शन को बढ़ावा देने और भा.कृ.अनु.प. कार्यक्रमों की समीक्षा के लिए नीतिगत समर्थन भी प्रदान किया।
अकाई के तहत सहयोग के 4 प्रमुख क्षेत्रों- (1) मानव संसाधन और संस्थागत क्षमता निर्माण (2) कृषि प्रसंस्करण और विपणन (3) उभरती प्रौद्योगिकी और (4) प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन के तहत सहयोगी अनुसंधान परियोजनाएं शुरू की गयी हैं। नॉर्मन बॉरलाग फैलोशिप और कोचरन फैलोशिप यू एस ए में प्रशिक्षण के लिए प्रदान की गयी और भारत एवं यूएसए में संयुक्त कार्यशालाओं का भी आयोजन किया गया।

कृषि शिक्षा पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन

23 नवंबर 2018, नई दिल्ली को श्रीमती कृष्ण राज, केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री, ने कहा कि देश में कृषि अनुसंधान और शिक्षा के सक्रिय समर्थन के माध्यम से 2022 के लक्ष्य से दोगुनी किसानों की आय हासिल की जा सकती है। आज वैश्विक अनुभव साझा करना करते हुए वह कृषि शिक्षा पर तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के प्रतिनिधियों को संबोधित कर रही थीं। केंद्रीय राज्य मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि हम विश्व खाद्य आवश्यकता के लिए अत्यधिक योगदान दे सकते हैं।

यह सम्मेलन भारतीय कृषि विश्वविद्यालय संघ (आई. ए. यू. ए.) के सुनहरे जयंती वर्ष के अवसर पर आयोजित किया गया है, जो देश में कृषि शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए राज्य, केंद्रीय और डीम्ड विश्वविद्यालयों की सहायता करता है। संयुक्त रूप से आई. सी. ए. आर. और नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज के साथ संगठित होकर वर्तमान में यह अपनी स्वर्णिम जयंती मना रहा है।

डॉ त्रिलोचन महापात्रा, सचिव, डी. ए. आर. ई. और डीजी, आई. सी. ए. आर., ने इस अवसर पर कहा कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए ज्ञान साझा करने और उपयोग करने के लिए वैश्विक कृषि नेटवर्क होना चाहिए। उन्होंने कहा, कुपोषण और भूख को कम करने के लिए वैश्विक समुदाय को मिलकर काम करना चाहिए।

डॉ. आर. बी. सिंह, पूर्व चांसलर, सी. ए. यू. इम्फाल; डॉ. पंजाब सिंह, अध्यक्ष, नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज; डॉ. एन. एस. राठौर, डीडीजी (शिक्षा), आई. सी. ए. आर.; डॉ. के. एम. बुजरबरौह, कुलपति, ए. ए. यू. गुवाहाटी; डॉ. एन. सी. पटेल, कुलपति, ए. ए. यू. आनंद ने भी इस अवसर पर प्रतिनिधियों को संबोधित किया।

इस सम्मेलन में, अमेरिका, चीन, दक्षिण कोरिया, मलेशिया, यूके, फ्रांस आदि जैसे 12 विभिन्न देशों के 25 प्रतिभागी भाग ले रहे हैं। कुल 55 कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति और देश के लगभग 55 डीन और निदेशक भाग ले रहे हैं।

कृषि शिक्षा दिवस

कृषि शिक्षा दिवस विशेषकर युवाओं के बेहतर भविष्य के लिए कृषि शिक्षा वहुत जरूरी है। युवाओं को कृषि से जोड़ने और भारत में कृषि शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए 3 दिसंबर का दिन कृषि शिक्षा दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। इसका मुख्य मकसद ज्यादा से ज्यादा युवाओं को कृषि की शिक्षा मुहैय्या करवाना और देश को कृषि क्षेत्र मे समृद्ध बनाना है। हालांकि इन दिनों यह बदलाव तेज़ी से देखा जा सकता है, कई ग्रामिण इलाकों के युवा कृषि की शिक्षा प्राप्त करके इसे रोज़गार का माध्यम बना रहे हैं। विभिन्न फल, फूल, सब्ज़ी की खेती, डेयरी, मछली पालन, मधुमक्खी पालन, सुकर पालन इत्यादि खेती से जुड़े कई ऐसे व्यव्साय हैं जो युवाओं के बीज प्रचलित हो रहे हैं।

कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR)

कृषि शिक्षा को बढ़ाने में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) एक अहम भूमिका निभा रहा है. यह दिवस देश के पहले कृषि मंत्री एवं राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के जन्म दिवस के अवसर पर मनाया जाता है। केंद्र सरकार विश्व बैंक की सहायता और सहयोग से 1 करोड़ रुपये की राशी के साथ राष्ट्रीय कृषि शिक्षा परियोजना की शुरुआत करने लगी है। जिससे हमारे देश के युवाओं को एक नई दिशा मिलेगी।

राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद

राजेंद्र प्रसाद हमारे देश के पहले राष्ट्रपति थे. वह भारतीय राजनीति के एक प्रबल नेता थे और वह एक अच्छे वकील भी थे, प्रसाद भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए और बिहार के क्षेत्र से एक प्रमुख नेता भी बने।

कृषि शिक्षा का उद्देश्य

इसका उद्देश्य केंद्रों की स्थापना करना, पिछड़े हुए राज्यों में युवाओं को कृषि शिक्षा के लिए बढ़ावा देना, कृषि पाठ्यक्रम को आधुनिक और आसान बनाकर उसकी गुणवत्ता को सुनिश्चित करना. सरकार द्वारा ऐसी कई योजनाएं निकाली गयी हैं, जिसपर अब काफी जोर दिया जा रहा है, जिससे कृषि शिक्षा प्रणाली में बदलाव किए जाए और सुधार लाया जाए. ताकि कृषि की शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों को सरकार द्वारा रोज़गार दिया जाए. छात्रों की दिलचस्पी को खेती की दिशा में प्रेरित करने के लिए प्रयास किया जाए हैं ताकि वे इस क्षेत्र में कुछ रुचि विकसित कर देश की कृषि में विकास कर सकें।
नोट: इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएआरआई), जिसे पूसा इंस्टीट्यूट के नाम से जाना जाता है, मूल रूप से वह पूसा बिहार में वर्ष 1911 में इंपीरियल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च के रूप में स्थित था। इसके बाद इसे 1991 में इंपीरियल एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट के नाम से बदल दिया गया और बड़े भूकंप के बाद वहां से इसे 1936 में दिल्ली लाया गया।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के द्वारा कृषि शिक्षा में उठाए गए महत्वपूर्ण कदम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा किसानों की आय को दोगुनी करने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए अनेक प्रय़ास किए जा रहे हैं। इस दिशा में कई सरकारी एवं गैर- सरकारी कंपनीयां कार्य कर रही हैं। इसी कड़ी में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने कृषि शिक्षा के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं जो कि इस प्रकार हैं-
  • छात्रों को रोजगार दिलाने में मदद हेतु चार वर्षीय स्नातक कृषि शिक्षा को प्रोफेशनल डिग्री का दर्जा।
  • राष्ट्रीय प्रतिभा छात्रवृति को रु.1000 से बढ़ाकर रु. 2000 प्रतिमाह और स्नातकोत्तर छात्रों के लिए रु. 3000 प्रतिमाह की नई राष्ट्रीय प्रतिभा छात्रवृति की शुरूआत।
  • छात्रों के कौशल विकास हेतु ‘स्टूडेंट रेडी’ स्कीम की शुरुआत जिसके अंतर्गत छात्रों को किसानों से कृषि पध्दतियों को सीखने-समझने का अवसर मिलेगा।
  • बिहार के राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय में परिवर्तित किया गया जिसके तहत चार नये महाविद्यालय स्थापित किये जायेंगे।
  • देश में 75 कृषि विश्विद्यालय हैं, जिसमे 64 राज्य- स्तरीय, 3 केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, 4 डीम्ड विश्वविद्यालय, तथा 4 केन्द्रीय विश्वविद्यालय है।
  • विश्व बैंक और भारत सरकार प्रयोजित राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना (NAHEP) को स्वीकृती।

कृषि शिक्षा की उपयोगिता - प्रश्न और उत्तर

वर्तमान कृषि शिक्षा और शोध पर आपकी राय क्या है ?

वर्तमान में कृषि शिक्षा नीति के तहत कृषि विश्वविद्यालयों में तीन विषयों पर जोर दिया जा रहा है शिक्षा, शोध तथा विस्तार, लेकिन विश्वविद्यालय दर विश्वविद्यालय इस में आपको विविधता दिखेगी। किसी में शोध, तो किसी में शिक्षा एवं विस्तार पर जोर है। कृषि विश्वविद्यालयें खासकर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के साथ काम करती है जिसके कारण शिक्षा के गुणवत्ता में सुधार आते जा रहा है। बच्चों में कौशल उन्नयन हो रहा है। शोध में भी क्रॉप डेवलपमेंट पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। यानि कि जलवायु परिवर्तन के हिसाब से ऐसे बीज एवं पौधे तैयार किए जा रहें हैं जो हरेक परिस्थिति में उग सके एवं पैदावार दे सके।

कृषि शिक्षा में कितनी दिलचस्पी ले रहे हैं युवा ?

कृषि शिक्षा में युवा पहले के तुलना में काफी ज्यादा संख्या में आ रहे हैं। अब छत्तीसगढ़ में ही देख लिजीए हमारे पास मात्र 3,000 सीटें परंतु 50,000 छात्रों ने एडमीशन के लिए आवेदन किया है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि ज्यादातर युवा कृषि शिक्षा के लिए आ रहे हैं, लेकिन इसे प्रोफेशन के रूप में नहीं अपना रहे हैं। शिक्षा जरूर ले रहे हैं, ताकि उन्हें पब्लिक या प्राइवेट क्षेत्र में रोजगार मिल सके।

युवाओं के लिए कृषि शिक्षा के क्या मायने हैं?

कृषि शिक्षा के क्षेत्र में रोजगार के मौके काफी अधिक हैं। खेती किसानी में मदद के लिए कृषि विशेषज्ञ या सहायक बन गांवों में किसानों को मदद मुहैया करवाने जा अवश्य रहें हैं लेकिन वे खेती को अपना पेशा नहीं बना रहें हैं। एमएससी कर लेता है तो या तो फिर शोध की ओर मुड़ जाता है नहीं तो शिक्षक बन जाता है। खुद एग्री बिजनेस मैन नहीं बन रहे हैं।

आपकी नजर में इस वक्त किसानों की क्या स्थिति है ?

भारत में कृषि क्षेत्र का आकलन किसानों की स्थिति को देख कर किया जाता है। इस में कोई दो राय नहीं है कि किसानों की स्थिति अच्छी नहीं है। इस प्रदेश में जरूर है कि शासन ने एमएसपी में वृद्दि एव कर्ज माफी जैसे मुद्दों पर ध्यान दिया है जिससे की थोड़ी सी राहत है। पर मौसम परिवर्तन की मार किसानों पर पड़ रही है। सरकार को किसानों की पैदावार की सही कीमत देने के लिए आगे आना होगा। ताकि उनके फसल का उचित मूल्य मिल सके।

बडी संख्या छोटे किसानों की है, उनको लेकर आपकी क्या राय है?

छोटे किसान की स्थिति अच्छी नहीं है यह हम सब जानते हैं। लेकिन, उन्हें उन्नत कृषि के ओर जाना होगा जहां उन्हें पता होना चाहिए की जलवायु परिवर्तन के हिसाब से कौन सी फसल कैसे लगानी है। किसानों की मदद के लिए सबको आगे आना चाहिए। इस बात पर भी जोर दिया जाना चाहिए कि नई युवा पीढ़ी किसानी को कैसे अपनाए।

क्या भारत अब कृषि संकट की चपेट में है? यदि हाँ तो क्यूँ?

फिर से वही बात दोहराउंगा किसान के संकट को कृषि संकट के रूप में देखा जा रहा है। यहां ज्यादा उत्पादन हो तब भी किसान को लाभ नहीं कम हो तब भी नहीं। यह बाजार आधारित विषय है, उचित मूल्य नियमन नहीं हे के कारण किसान को हानि है। इस पर ध्यान देने की जरूरत है। रही बात उत्पादन की तो 1950 में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उत्पादन 450 ग्राम और अब है 500 ग्राम जबकी जरूरत होती है 750 ग्राम।

क्या भारत अभी भी कृषि प्रधान देश है ?

आज भी भारत 52 प्रतिशत से अधिक आबादी कृषि पर आधारित है। इसलिए इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। वेनेजुएला एक तेल आधारित राष्ट्र है लेकिन कृषि चौपट है। अतः लोगों को एक किलो नोट से भी एक केला खरीदना मंहगा पड़ रहा है। बिना कृषि सब बेकार है। इसलिए कृषि पर ध्यान देने की जरूरत है। अगला युद्ध अनाज पानी पर कंट्रोल लेकर ही होने वाला है।

क्या भारत के पास इतनी जमीने एवं संसाधन है कि कृषि को आने वाले दिनों में लाभकारी बनाया जा सके?

बिलकुल, इसके लिए हमको इंफोटेक और क्वालिटी सीडिंग की ओर जाना होगा। कृषि को कमर्शियालाईज करना होगा। भारत में खेत का औसत आकार 1.2 हेक्टेयर है जबकि चीन में खेत का आकार .6 हेक्टेयर। हमारे खेतों के आकार से करीब आधा है उसके बाद भी चीन खेती में पूरे विश्व में नंबर 1 पर है। भारत में पिछले 50 वर्षों से दलहन का आयात हो रहा था। हम सब उसके पीछे पड़े और पिछले दो वर्षों में दाल में सरप्लस हो गए। हमें मानसून आधारित खेती के जगह पर ड्रीप ईरिगेशन तकनीक को सभी किसानों को सुलभ करना होगा और फिर अन्य महत्वपूर्ण उपाय हैं जो करना होगा तो हमारी कृषि भी लाभ कारी हो जाएगी।

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